पर्वत की चोटी पर श्रद्धा का केंद्र

पर्वत की चोटी पर श्रद्धा का केंद्र
 
हिंदू धर्म में मान्यता है कि जब भगवान का बुलावा आता है तो श्रद्धालु अपने आप उस जगह की ओर खिंचे चले जाते हैं जहां पर उनके भगवान का निवास माना जाता है भले ही वह जगह कितनी भी दुर्गम और खतरनाक क्यों न हो। ऐसी ही एक तीर्थस्थल कैलाश मानसरोवर है जिसे हम शिव-पार्वती के घर के रूप में जानते हैं। समुद्र सतह से 22,022 फीट ऊंचे कैलाश पर्वत की यात्रा अत्यंत कठिन मानी जाती है यहां पर पहुंचने वाला श्रद्धालु अपने आप को भाग्यशाली समझता है।
 
क्या कहता है इतिहास
 
पौराणिक मान्यताओं की मानें तो कैलाश मानसरोवर कुबेर की नगरी है। यहीं से महाविष्णु के करकमलों से निकलकर गंगा कैलाश पर्वत (शिव प्रभु) की चोटी पर गिरती है, जहां प्रभु शिव उन्हें अपनी जटाओं में भर धरती में निर्मल धारा के रूप में प्रवाहित करते हैं। कैलाश पर्वतमाला कश्मीर से लेकर भूटान तक फैली हुई है। ल्हा चू और झोंग चू के बीच कैलाश पर्वत है जिसके उत्तरी शिखर का नाम कैलाश है।
 
कैलाश पर्वत का आकार
 
कैलाश पर्वत को च्गणपर्वत' और 'रजतगिरिच् के नाम से भी जानते हैं। कैलाश पर्वत के दक्षिण भाग को नीलम, पूर्व भाग को क्त्रिस्टल, पश्चिम को रूबी और उत्तर को स्वर्ण रूप में माना जाता है। कैलाश के चारों दिशाओं में विभिन्न जानवरों के मुख हैं, जिसमें से नदियों का उद्गम होता है, पूर्व में अश्वमुख है, पश्चिम में हाथी का मुख है, उत्तर में सिंह का मुख है, दक्षिण में मोर का मुख है।
 
कैलाश पर्वत का आकार एक पत्थर के पिरामिड जैसा है, जिसके शिखर की आकृति विराट शिवलिंग की तरह है। यह हिमालय के उत्तरी क्षेत्र में तिब्बत में स्थित एक तीर्थस्थल है जो चाइना के अधीन है। कैलाश पर्वत की चार दिशाओं से ब्रह्मपुत्र, सिंधु नदी, सतलज व करनाली नदियों का उद्गम हुआ है जो एशिया की बड़ी नदियां हैं।
 
भक्तों का जमावड़ा
 
कैलाश पर्वत तिब्बती धर्म, बौद्ध धर्म, जैन धर्म और हिन्दू धर्म का आध्यात्मिक केन्द्र है। सदियों से भक्त यहां विश्व के कोने-कोने से अपने ईश्वर के दर्शन करने के लिए आते हैं। हर साल हजारों की संख्या में कैलाश-मानसरोवर की यात्रा करने, शिव-शंभू की आराधना करने हज़ारों साधु-संत, श्रद्धालु, दार्शनिक यहां एकत्रित होते हैं। यहां आने वाले भक्तों को शिव की मौजूदगी का एहसास होता है।
 
कैलाश पर्वत की यात्रा
 
भारत से हजारों तीर्थयात्री कैलाश मानसरोवर की यात्रा करते हैं। इसके लिए उन्हें भारत की सीमा लांघकर चीन में प्रवेश करना पड़ता है, क्योंकि यात्रा का यह भाग चीन में है। अगर आप कैलाश पर्वत की यात्रा करना चाहते हैं तो इसके लिए भारत के विदेश मंत्रालय में अपना प्रार्थनापत्र देना होता है। चीन से वीजा मिलने के बाद ही आप कैलाश मानसरोवर की यात्रा कर सकते हैं। वर्ष 1962 के भारत-चीन युद्ध की वजह से बंद हुए इस मार्ग को धार्मिक भावनाओं के मद्देनजर दोनों देशों की सहमति से वर्ष 1981 में पुन: खोल दिया गया था।
 
कैलाश पर्वत की यात्रा विविध प्राकृतिक सौन्दर्य और एडवेंचर से भरी हुई है। यह दुनिया के सबसे बड़े बंजर और निर्जन क्षेत्र में से एक है। यहां दूर-दूर तक मानव निवास नहीं है। सामान्यतया यह यात्रा 28 दिन में पूरी होती है। यात्रा का कठिन भाग चीन में है। उंचाई पर होने की वजह से तीर्थयात्रियों को कई पर्वत-श्रृंखलाएं पार करनी पड़ती हैं। अगर आप कैलाश मानसरोवर की यात्रा करना चाहते हैं तो आप सुनिश्चित कर लें कि आपको स्वास्थ्य संबंधी समस्या तो नहीं है। मानव निवास न होने की वजह से आपको इस यात्रा में जल, भोजन एवं निवास तक की व्यवस्था स्वयं करनी होगी।
 
कैसे पहुंचें
 
कैलाश पर्वत तक जाने के लिए दो मार्ग हैं। एक रास्ता भारत में उत्तराखंड से होकर गुजरता है लेकिन ये रास्ता बहुत मुश्किल है क्योंकि यहां ज्यादातर यात्रा पैदल चलकर ही पूरी करनी होती है। दूसरा रास्ता नेपाल की राजधानी काठमांडू से है।
 
सड़क मार्ग
 
अगर आप सड़क मार्ग से जाते हैं तो कैलाश पर्वत पहुंचने में करीब 28 से 30 दिनों तक का समय लगता है। यहां के लिए सीट की बुकिंग एडवांस भी हो सकती है और निर्धारित लोगों को ही ले जाया जाता है। हर साल इस रास्ते से 6000 हजार लोग कैलाश पर्वत के लिए आवेदन करते हैं जिनमें से केवल 400 लोगों को जाने की अनुमति विदेश मंत्रालय देता है।
 
वायु मार्ग
 
आप कैलाश पर्वत तक जाने के लिए हेलिकॉप्टर की सुविधा भी ले सकते हैं। काठमांडू से नेपालगंज और नेपालगंज से सिमिकोट तक पहुंचकर, वहां से हिलसा तक हेलिकॉप्टर द्वारा पहुंचा जा सकता है। इसके लिए आपको कम से कम 10-12 दिन लगेगा। आप मानसरोवर तक पहुंचने के लिए लैंडक्रूजर का भी प्रयोग कर सकते हैं।
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