भगवान शंकर सारे जगत के गुरूदेव

भगवान शंकर सारे जगत के गुरूदेव

विष्णु और ब्रह्मा, स्वयं भगवान शंकर ही गुरूदेव हैं। (प्रमाण श्री शिव महापुराण विद्येश्वर संहिता अध्याय ९-१० पृष्ठ ३८-४२ एवं सृष्टिखंड अध्याय ६-१० पृष्ठ १०५-११६)
श्री अरूणाचल पर्वत विश्व का सर्वोत्तम तीर्थ है। ब्रह्मा-विष्णु को ज्ञान की प्राप्ति वहीं पर हुई थी। शिवलिंग की उत्पत्ति एवं शिवलिंग पूजा वहीं से प्रारंभ हुई।लाखों विदेशी श्री अरूणाचल की परिक्रमा करके शंाति का अनुभव करते है। श्री अरूणाचल मंदिर विश्व का प्रसिद्ध मंदिर है। श्री अरूणाचल मंदिर के पण्डे मॉंसाहारी और व्यसनी क्यों है? श्री अरूणाचल पर्वत के परिक्रमा मार्ग में ही महर्षि रमन का आश्रम है। शैषाद्रि का आश्रम है। राय सुरत कुमार का आश्रम है। इन तीन आश्रमों के ट्रस्टी मॉंसाहारी और व्यसनी क्यों है? श्री अरूणाचल पर्वत की परिक्रमा करने वालों की सभी मनोकामनाओं की पूर्ति क्यों नहीं हो रही है?

भारत में उड़िसा राज्य की राजधानी भुवनेश्वर में प्रसिद्ध मंदिर लिंगराज है। इस मंदिर के पण्ड़े मॉसाहारी हैं और व्यसनी है। इस मंदिर में दर्शन करने वालें और यहॉं दान करने वालों की सभी मनोकामनाओं की पूर्ति क्यों नहीं हो रही है ?

श्री जगन्नाथपुरी भारत का एक प्रसिद्ध तीर्थ है। यहॉं की रथऱ्यात्रा प्रसिद्ध है। यहॉं आदिगुरू शंकराचार्य द्वारा स्थापित एक मठ भी है। जगन्नाथपुरी मंदिर के पण्डे मॉंसाहारी है और व्यसनी है। श्री जगन्नाथपुरी का दर्शन करने वालें और यहॉं दान करने वालों की सभी मनोकामनाओं की पूर्ति क्यों नहीं हो रही है?
राजस्थान में श्री नाथद्वारा में प्रसिद्ध श्रीनाथजी का मंदिर है जहॉं श्री कृष्ण का एक स्वरूप विराजमान है। अधिकांश गुजराती समाज बड़ी श्रद्धा भक्ति के साथ इस मंदिर में दर्शनार्थ हर वर्ष आते हैं, श्रद्धा भक्ति से दर्शन पूजन करते हैं और बहुत सा दान भी करते है। श्रीनाथजी को दान देने वालों की सभी कामनाओं की पूर्ति क्यों नहीं हो रही है? इस प्रकार अन्य देव-स्थानों का भी हाल है।

इसका कारण है - दान के साथ दाता का पाप ही आता है। अत: दान लेने वाला व्यक्ति यदि सच्चे देहधारी गुरू से दीक्षित नहीं है और निर्गुण ब्रह्म की पूजा में दीक्षित कर्मकाण्डी ब्राह्मण जो कि दिव्य नदी नर्मदा के तट पर रह रहा है, उसको दान दिए बिना दान को पचाना असंभव है और निश्चित रूप से दान लेने वाला व्यसनी होगा और दाता को भी लाभ नहीं मिलेगा।

"जननी जने तो भक्त जन, या दाता या शूर -- नहीं तो रहे बॉंझ, कॉहे गॅंवाएं नूर "

इसका सरल अर्थ यह है कि भक्त, दानी अथवा शूरवीर सन्तान ही कुल-तारक हो सकती है। मरना तो सभी को है। आपने जीवन भर पुण्य कर्म किए, किसी का अहित नहीं किया,किसी का दिल नहीं दुखाया, जीवन भर शरीर से - धन से परोपकार किया। अब आप मरकर स्वर्ग में जायेंगे। परन्तु आपके मरने के बाद आपकी संतान ने श्रद्धा-भक्ति से, आपका वार्षिक श्राद्ध नहीं किया तो वही आपकी संतान ,आपकी मृत्यु होने के पश्चात् भी आपको स्वर्ग से नरक में ढकेल सकती है। क्या आप नरक में जाने के लिए तैयार है? नहीं । तो आपने नरक से बचने के लिए क्या व्यवस्था की है ?

आपने जीवन में धन कमाया है, परन्तु निर्गुण ब्रह्म का भाग नहीं निकाला और प्रभु कृपा से प्राप्त उस धन से आपने अपनी पत्नी और सन्तान को सुख दिया है। यह पत्नी और संतान आपको यम यातनाओं से नही बचा सकते। निर्गुण, निराकार, अजन्मा ब्रह्म(शिव) का भाग, सही तीर्थ पर सही व्यक्ति द्वारा प्रयोग न कराने पर , अगले जन्म में आप निश्चित रूप से दरिद्री रहेंगे, जाति से नीचे गिर जायेंगे, पशु-पक्षी भी बन सकते हैं।

1अत: धन कमाने वालों को विशेष रूप से सावधान रहना चाहिए कि उनका अगला जन्म न बिगड़े।

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